मेरे चंद सवाल….

“This post is a part of ‘The Woman That I Am’ Blog Hop #TheWomanThatIAm organised by Rashi Roy and Manas Mukul #RR×MM.The event is sponsored by Kraffiti.”

क्यों दूं मैं अग्नि परीक्षा,
क्यों मैं धरा में समाऊँगी?
गर है विश्वास तो थाम लो हाथ मेरा
वरना तुम्हारे दर ना आऊंगी।

हे राम ! तुम्हारे आने पर
घर घर में, दीपक घी के जलाये जाएंगे।
बनवास तो काटा मैंने भी
पर मेरा क्या,अग्नि में जलाई जाऊंगी।
गर है विश्वास तो थाम लो हाथ मेरा
वरना तुम्हारे दर ना आऊंगी।

सोने का हिरण जो चाहा होता
फिर इस वन में, मैं आती क्यों?
ये सब तुम्हारी ही माया थी
वरना, लक्ष्मण को पीछे भगाती क्यों?
लक्ष्मण रेखा पार करने की
मैं ही, दोषी ठहराई जाऊंगी।
गर है विश्वास तो थाम लो हाथ मेरा
वरना तुम्हारे दर ना आऊंगी।

नहीं मेरी बात सुनी तुमने
लोगों की बात पर किया यकीन
खुद बन बैठे मर्यादा पुरुषोत्तम
मुझे ठहरा दिया चरित्रहीन
मैं फिर अशोक वाटिका से
वाल्मीकि आश्रम, पहुँचाई जाऊँगी
गर है विश्वास तो थाम लो हाथ मेरा
वरना तुम्हारे दर ना आऊंगी।

नहीं मांगती जन्मों का बंधन
इस जन्म में बस सम्मान मिले
नहीं चाहिए दो घर औरत को
बस एक घर में तो स्थान मिले।
कब तक मैं एक सामान के जैसे
दर दर भटकाई जाऊँगी
गर है विश्वास तो थाम लो हाथ मेरा
वरना तुम्हारे दर ना आऊंगी।

हाँ …मैं अपना घर बनाऊँगी
तुम्हारे दर ना आऊंगी।
तुम्हारे दर ना आऊंगी।


         औरत ईश्वर की सब से सुंदर रचना है चाहे वो किसी भी रूप में हो ।माँ,बहन,पत्नी ,बेटी,सखी हर रूप में औरत सर्वश्रेष्ठ है।ईश्वर के बाद हम किसी से दया की उम्मीद कर सकते हैं तो वो औरत है।अथाह प्रेम का सागर छलकता है …औरत के मन के अंदर।अपनी खुशियों को एक तरफ़ रख कर हमेशा दूसरों की खुशियों में खुश रहने का काम केवल और केवल एक औरत ही कर सकती है।औरत के इस कोमल हृदय को उस की कमज़ोरी मान कर ये संसार हमेशा औरत की अग्नि परीक्षा लेता आया है।हमेशा औरत के लिए दो रास्ते रखे जाते हैं और उन में से उस ने किसी एक को चुनना होता है।हर बार उस को परीक्षा से गुजरना पड़ता है। केवल इस युग में ही नहीं हर युग में औरत    परीक्षा से गुजरती रही है।हर बार इम्तिहान से गुजरती रही है।अपनी परवाह छोड़ कर वह दूसरों की खुशियों के लिए हर इम्तिहान से गुजर जाती है।परन्तु लोगों को फिर भी तसल्ली नहीं होती।एक इम्तिहान पास करते ही दूसरे इम्तिहान शुरू कर देते हैं।एक पत्नी हर एक सुख-दुख में अपने पति के साथ खड़ी होती है।सुख है तो उसकी खुशी में खुश रहती है;दुख है,मुसीबत है तो साथ में कंधे से कंधा मिला कर चलती है, जब मुसीबतों के बादल छंट जाते हैं तो उन मुसीबतों का जिम्मेदार ही औरत को ठहरा दिया जाता है और फिर शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला और औरत की अग्नि परीक्षा इन सब में औरत के हिस्से में केवल और केवल तिरस्कार ही आता है।
        औरत को बचपन से ही यही संस्कार दिए जाते हैं कि हर सुख-दुख में पति का साथ देना ही तुम्हारा परम धर्म है।औरत अपने उन्हीं संस्कारों से बंधी अपने हर कर्तव्य का पालन करती है।
     अग्नि परीक्षा सीता माता ने भी दी।राजा जनक की बेटी जब श्री राम की पत्नी बनीं तो क्या उन्होंने सोचा होगा कि कल जो रानी बनने वाली है उन्हें बनवास जाना होगा। बनवास तो केवल श्री राम को मिला था पर पत्नी धर्म तो यही कहता है हर हाल में पति का साथ देना।कैसे वो राज महल में रह सकती थीं श्री राम के बनवास में रहते??? बनवास जा कर  भी साथ न मिला श्री राम का उन्हें।रावण का वरण नहीं किया श्री राम का इंतजार किया अशोक वाटिका में रह कर।बनवास से वापिस आ कर क्या उन्हें राज-पाट का सुख मिला??एक धोबी के कहने पर चरित्रहीन ठहराया गया,अग्नि परीक्षा ली गई,उस में से भी पार हो गई पर खुद को साबित न कर पाईं ।बनवास के बाद फिर श्री वाल्मिकी जी के आश्रम पहुंचा दी गईं।लव-कुश के अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा थामने पर श्री राम अपने बेटों को पहचान पाए। अपमान की इतनी पीड़ा सहन करने के बाद सीता माता में इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि फिर से वाल्मिकी आश्रम से राज महल में आकर रहें।उन्होंने अपने स्वाभिमान के लिए धरा में समाना बेहतर समझा। श्री राम का त्याग सबने देखा लेकिन सीता माता की वेदना किसी ने समझने की कोशिश नहीं की।
        औरत को अब भी यही कहा जाता है कि अग्नि परीक्षा तो सीता माता को भी देनी पड़ी थी तो तुम क्या चीज़ हो?? अब भी कुछ लोग ये कहते हैं कि सीता माता को सोने का हिरण चाहिए था,उन्होंने ही श्री राम को भेजा था और फिर लक्ष्मण को पीछे भेजने के बाद उसकी बात भी नहीं मानी,लक्ष्मण रेखा पार कर के रावण को भिक्षा देने चली गई।कुछ कवियों ने भी कहा है-“सोने का हिरण चाहेगी जो सीता; बिछड़ जाएँगे उससे राम तय है।”अगर सीता को सोने का हिरण चाहिए होता तो राज महल में ही रहती,बनवास काटने क्यों आती। रावण के जाल को समझ नहीं पाई,घर से कोई खाली हाथ नहीं जाना चाहिए यह संस्कार निभाते हुए लक्ष्मण रेखा पार कर गई।
           इतिहास ऐसी बहुत सी उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां औरत को खुद को साबित करना पड़ा।अग्नि परीक्षा और अवसाद में तिल-तिल कर जलने में मुझे थोड़ी सी समानता नज़र आई तो मैंने सीता माता का उदाहरण चुना।सीता माता का उदाहरण औरत की दशा समझाने का प्रयास मात्र है किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना मेरा उद्देश्य नहीं है।
        सीता माता के पास तो विकल्प मौजूद थे।वाल्मिकी आश्रम,धरा में समाना लेकिन आज की औरत जब खुद को साबित नहीं कर पाती समाज और परिवार को साथ खड़ा नहीं पाती ,घर छोड़ कर कहीं नहीं जा पाती तो उसके पास कोई विकल्प नहीं होता सिवाय आत्महत्या के।अपने बच्चों के कारण अगर वो ऐसा नहीं कर पाती तो अवसाद का शिकार हो जाती है जो शायद मौत से भी बद्तर होता है क्योंकि अवसाद एक धीमा ज़हर होता है जिसका शिकार व्यक्ति रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है ।अगर वो अवसाद से बाहर आ भी जाती है , अपने बच्चों के लिए …अलग हो कर जीना शुरू कर भी देती है तो वो भी शायद लोगों को बरदाश्त नहीं होता। एक औरत अपने पहले पति के साथ खुश नहीं रह पा रही है,वह घुट रही है अगर वो अपनी बच्ची के लिए अलग हो रही है तो क्या उसे जीने का हक नहीं रहा। उसके चरित्र पर उँगली उठा दी जाए… औरत जाए तो जाए कहाँ??? ये सोचने पर मज़बूर हो जाता है मन कई बार!!!
मेरा ये सब लिखने का मर्म ये है कि हर बार औरत का ही कसूर नहीं होता ।हर बार औरत का ही इम्तिहान क्यों लिया जाता है? भगवान के बाद अगर कोई संसार की रचना कर रहा है तो वो औरत है। औरत ही जननी है इस संसार की।भगवान ने उसे इतना कोमल हृदय दिया है जो हर एक का दुख देख कर पिघल जाता है चाहे वो कोई दुश्मन ही क्यों न हो।हर एक की खुशी में खुश होता है। फिर भी उसका दिल दुखाया जाता है।फिर भी वो सब कुछ भुला कर अपने काम में लग जाती है। कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक कहानी पढ़ी थी कि एक सभा में एक बोर्ड पर औरत के सारे रिश्ते लिख दिए जाते हैं और उन में से उसे रिश्ते चुनने के लिए कहा जाता है। औरत रोती-बिल्खती सब से पहले अपने जन्म दाता माँ -बाप का नाम मिटाती है,फिर भाई-बहनों का,उस के बाद बच्चों का जिन्हें उस ने जन्म दिया है ।आखिर में उस के पति का नाम रह जाता है कि अंत में वही उस के साथ रह जाएगा।वो तो चलो बाद की बात है कि कौन आखिरी वक्त में साथ होगा। औरत को उस दुविधा में डाला क्यों गया ?? उसे रिश्तों का चुनाव करने के लिए कहा ही क्यों गया?? जब एक औरत सारे रिश्तों को साथ लेकर चलने की ताकत रखती है तो क्यों उसे चुनाव करने के लिए कहा जाता है,क्यों उसे रिश्तों के भँवरजाल में उलझाया जाता है ?? जिन माँ -बाप की वजह से उसका वजूद इस दुनिया में है शादी के बाद वो उन्हें भूल कैसे जाए…जिन भाई-बहनों के साथ बचपन बिताया,सुख-दुख बाँटे वो कैसे उन को मन से निकाल दे?? जैसे-जैसे वो इम्तिहान देती जाती है और इम्तिहान उस के लिए तैयार होते रहते हैं। हर बार उस की सत्यनिष्ठा पर संशय किया जाता है।इन इम्तिहानों से गुजरते हुए अपनी जिंदगी तो वो जीना ही भूल जाती है।सब कुछ अपने मन में रख कर बहुत कुछ अनकही बातें अपने साथ लेकर इस दुनिया से विदा हो जाती है।क्या किया औरत ने अपने लिए …खुद के लिए जी तक नहीं पाई।रिश्तों में ही उलझी रही।
ये बात सभी औरतों पर भी लागू नहीं होती।कुछ जीती भी हैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से लेकिन समाज की नजरों में खटकती हैं।उन्हें पता नहीं किन-किन नामों से बुलाया जाता।है। कुछ पढी़ -लिखी औरतों सिर्फ इस लिए घर पर बैठी रह जाती हैं कि उनके पति को कोई ये न कह दे कि औरत की कमाई  से घर चल रहा है।ये सोच कहाँ ले कर जा रही है समाज को??घर के फैसले लेते समय औरत की सलाह ज़रूरी नहीं समझी जाती।कुछ बोलने से पहले ही उसे चुप करवा दिया जाता है।बेटी को पिता के घर में पराया धन कह कर रखा जाता है और ससुराल में पराई बेटी कह कर दुत्कारा जाता है।न उसे मायके में जगह मिलती है,न ससुराल में सम्मान।दो-दो घर होने के बावजूद भी इधर से उधर लुढकती रहती है।हर बार इम्तिहान देती रहती है।इतना सब करने के बाद भी यही कहा जाता है कि औरत को समझना बहुत मुश्किल है।औरत को हमेशा परखते रहेंगे तो कभी उसे समझ नहीं पाएँगे।औरत को समझने की कोशिश करने वाले उसे समझ नहीं पाते क्योंकि उसकी जगह पर खुद को रख कर समझना पड़ेगा और वो ऐसा कर नहीं पाते। औरत की दशा सुधारने का काम उसे जन्म देने वाले माता-पिता से ही शुरू करना पड़ेगा।बेटियों को बोझ न समझें,उन्हें पढ़ाएँ- लिखाएँ ,आत्मनिर्भर बनाएँ। शादी के वक्त विदा ज़रूर करें ,कन्यादान नहीं।लड़की एक सामान नहीं है कि आप उस को दान कर रहे हैं ।विदाई के वक्त ये न कहें कि आज से तू पराई हुई।आपने ही पराया कर दिया तो दूसरे घर के लोग भी पराया ही मानेंगे। उसका अपना घर  कहाँ होगा???माता-पिता का घर उसे पराया न लगे उन्हें ,इस तरह विदा करें बेटी को।औरत कोई पायेदान नहीं है कि सब उस से पैर साफ़ कर के अंदर आएँ न ही उस में काबलियत की कमी है कि उसे केवल रसोई घर तक सीमित रखा जाए। औरत एक अगरबत्ती के जैसे है जिस में आग भी है,धीरज  भी है,सहनशीलता भी है जो खुद के धीरे-धीरे जला कर परिवार को सुगंधित रखने की योग्यता रखती है। अब औरत थक चुकी है इम्तिहान दे -दे कर।अब वो अपना हक चाहती है और कहना चाहती है…..अब बहुत हुआ……..बस अब बहुत हुआ।।।

मेरा पहला प्यार—-मेरे माँ-पापा

मेरी ब्लॉग साईट मेरे माँ-पापा को समर्पित है।जिनके प्यार,संस्कारों और त्याग ने मुझे एक मज़बूत इंसान बनाया।आज 28 फरवरी मेरे माँ-पापा की शादी की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर मैं अपना पहला ब्लॉग उनके इस प्यारे और मज़बूत रिश्ते को समर्पित करती हूँ।

मेरे प्यारे माँ-पापा
               आज आपकी शादी की 50वीं वर्षगांठ है।आपके इस प्यार और समर्पण के 50साल पूरे होने पर आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।मैं आपको सम्मान और धन्यवाद के अलावा कुछ भी देने में काबिल नहीं हूँ।जिन्होंने मुझे जिंदगी दी…….जिनकी वजह से मेरा वजूद है मैं उनको क्या दे सकती हूँ????जिस तरह से आपने मेरी परवरिश की…… मुझे संस्कार दिए जिनकी बदौलत आज मैं इस दुनिया में विचर रही हूँ।
      सबसे पहले मैं शुक्रिया करना चाहती हूँ अपने पापा का।हम कई बार माँ के प्यार के आगे पापा का स्नेह व त्याग अनदेखा कर देते हैं या यूं कहिए कि पापा के प्यार को माँ का आँचल ढक देता है।पिता की मौजूदगी सूरज की तरह होती है।सूरज गरम जरूर होता है लेकिन न हो तो अंधेरा छा जाता है। लेकिन मैंने आपके स्नेह और त्याग को देखा भी है और महसूस भी किया है।घर में सबसे छोटी और तीन भाईयों की इकलौती बहन होने के कारण हर चीज़ सबसे ज़्यादा और पहले मिली चाहे वो आपका प्यार हो या कुछ और…….।मैं जितना माँगती मुझे दुगुना मिलता था चाहे आपको कुछ भी करना पड़े।एक बात बताऊँ पापा……. मुझे जो भी चाहिए होता था मैं उससे आधा ही माँगती थी…..जानती थी …… मुझे दुगुना ही मिलेगा।बेटी तो आपकी ही हूँ……।मुझे इतना प्यार देने के लिए और हमारी इच्छाओं के लिए अपनी ख्वाहिशों को दिल में रखने के लिए बहुत शुक्रिया पापा…..।
         अब बात करते हैं माँ की…..।माँ तो होती ही प्यार और दुलार का भंडार है….. जिंदगी की पहली अध्यापिका।पहले सबक के साथ साथ जिंदगी के और भी पाठ पढ़ाए आपने माँ……जो कि जिंदगी के लिए बहुत ज़रूरी थे।आपकी दी हुई सीख के कारण ही जिंदगी में कभी हार नहीं मानी मैंने….हर पड़ाव पर साहस से काम लिया।आपने किसी चीज़ की कमी नहीं आने दी माँ।मेरी हर छोटी से बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखने के लिए बहुत शुक्रिया माँ…..।
        मैंने आप दोनों को एक आदर्श जोड़े के रूप में देखा है।एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हुए।पापा ने हमारे लिए घर से बाहर काम किया और माँ ने घर में रहते हुए ….।पापा बाहर अपना काम बखूबी संभाल रहे थे तो उसके पीछे माँ का योगदान था क्योंकि बिना डोर के पतंग उड़ नहीं सकता।आपने माँ के योगदान को कभी कम नहीं आँका….न ही माँ ने घर संभालने का बखान किया।दोनों ने मिलकर हमारी सब ज़रूरतों को पूरा किया।
        न किसी ने कम न किसी ने ज़्यादा
         जो भी किया दोनों ने आधा-आधा।
         न आए कोई कमी हमें
         बस यही था इरादा।
         नहीं झुकाएंगे सिर कभी आपका
         ये हमारा भी आपसे है वादा।
इतने स्नेह-प्यार और त्याग के लिए बहुत शुक्रिया माँ-पापा।आपके बारे में लिखने के लिए शब्द और समय दोनों कम पड़ जाते हैं….यहीं समाप्त करती हूँ।
    आपकी लाडो रानी

मेरी प्रेरणा —मेरे माँ-पापा